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अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पहरा? सच्ची टिप्पणी पर दर्ज हुआ मामला

सच के खिलाफ कार्रवाई! पुलिस प्रशासन की भूमिका पर उठे तीखे सवाल

एक जिम्मेदार नागरिक द्वारा की गई एक सच्ची और तथ्यपरक टिप्पणी पर जिस तरह की कार्रवाई सामने आई है, उसने पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि संबंधित व्यक्ति को थाने बुलाकर घंटों जबरन बैठाया गया और बाद में कथित रूप से झूठे प्रकरण में मामला दर्ज कर दिया गया—वह भी पुलिस अधीक्षक श्रीमती भावना गुप्ता के मार्गदर्शन में।
यह घटना केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता को उजागर करती है, जहाँ सवाल पूछना, सच कहना या व्यवस्था की खामियों की ओर इशारा करना अपराध की श्रेणी में ला दिया जा रहा है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संविधान द्वारा संरक्षण प्राप्त है, लेकिन जमीनी हकीकत में यदि एक सामान्य नागरिक को अपनी बात रखने की इतनी भारी कीमत चुकानी पड़े, तो व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा?
बताया जा रहा है कि जिस टिप्पणी के आधार पर कार्रवाई की गई, वह न तो अशोभनीय थी, न ही कानून-व्यवस्था बिगाड़ने वाली। इसके बावजूद धारा 170, 126 और 135 जैसी धाराओं के तहत मामला दर्ज कर देना यह दर्शाता है कि पुलिस प्रशासन वास्तविक अवैध गतिविधियों पर ध्यान देने के बजाय आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने में अधिक तत्पर दिखाई दे रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब आम जनता के साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है, तो फिर पत्रकारों की स्थिति क्या होगी—जो रोज़ सच को सामने लाने का जोखिम उठाते हैं? यदि एक सही टिप्पणी पर ही दमनात्मक कार्रवाई होने लगे, तो निष्पक्ष पत्रकारिता और जनहित की आवाज़ कैसे सुरक्षित रहेगी?
यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और संवेदनशीलता पर सीधा प्रश्न उठाता है। पुलिस का दायित्व जनता की रक्षा करना है, न कि डर का माहौल बनाना। आलोचना को अपराध मान लेना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है और इससे प्रशासन व जनता के बीच विश्वास की खाई और गहरी होती है।
अब सवाल यह नहीं है कि किस व्यक्ति पर केस दर्ज हुआ, बल्कि सवाल यह है कि
क्या सच बोलना अब अपराध बन चुका है?
क्या पुलिस प्रशासन आलोचना से ऊपर है?
और सबसे अहम—क्या लोकतंत्र में सवाल पूछने की कीमत चुकानी पड़ेगी?
पुलिस प्रशासन को चाहिए कि वह इस पूरे प्रकरण पर आत्ममंथन करे, निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे और यह संदेश दे कि कानून का इस्तेमाल डराने के लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए होता है। क्योंकि यदि सच बोलने वालों को चुप कराया जाएगा, तो लोकतंत्र की आवाज़ भी धीरे-धीरे दबती चली

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